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कविता : बसन्त - डॉ. रश्मि दीक्षित 

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कविता : बसन्त

देखो आया बसन्त,

छा गया बसन्त,

मदमस्त पवन के झोंको ने,

उल्लासित कर दिया जीवन,

चहुंओर बिखरा है पतझड़, 

नव पल्लवन बिखेर रहा यौवन,

झूम रहे पलाश ,

बौरा गई अमराई, 

फाल्गुन के स्वागत में महक रही पुरवाई

चारों ओर बिखरा बसन्त है, 

आ गया बसन्त है, आ गया बसन्त है,

प्रकृति ने प्रेम गीत छेड़ दिया,

पत्तो की सरसराहट,

चूड़ियों की खनखनाहट ने संगीत दिया,

कोमल सी धूप तन मन को भा रही है,

बासन्ती खुशबू प्रकृति को महका रही,

आया बसन्त है, छाया बसन्त है।

फूल उठी है मधुमालती,

पलाश पर भी यौवन छाया है,

काग ,कोकिला हुए भिन्न, 

वाणी ने रस बरसाया है,

पीली सरसों ने हल्दी चढ़ा दी धरा को,

टेसू के सिंदूरी रंग ने सुहागन कर दिया वसुंधरा को,

हर ओर छाया उल्लास उमंग है,

आया बसन्त है, देखो छाया बसन्त है।

- डॉ. रश्मि दीक्षित 

खंडवा (मध्यप्रदेश)