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मेरी कलम : स्त्रियों की आजादी, अधिकार और वजूद - सुषमा सिंह कर्चुली

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मेरी कलम : स्त्रियों की आजादी, अधिकार और वजूद

ऐसा नहीं है कि आजादी, अधिकार और अपने वजूद की चाह बालिकाओं एवं महिलाओं में आज जाग्रत हुई है l प्राचीन समय में मीरा बाई या महादेवी ने किसी न किसी रूप में स्त्रियों की स्वतंत्रता न होने के कारण उन पर होने वाले अत्याचारों का वर्णन अपनी रचनाओं मे भी किया है। यही नहीं समय -समय पर उन्हें सामाजिक बेड़ियों से भी मुक्त कराने हेतु आवाज़ भी उठाई है l 21 वीं सदी आते-आते संविधान द्वारा धीरे-धीरे बालिकाओं और महिलाओं के लिए कई कानून पारित किए गए हैं जिसमें घरेलू हिंसा, दहेज निरोधी, बालविवाह निरोधी, सती निरोधक, शिक्षा एवं स्वतंत्रता का अधिकार भी शामिल है। धीरे- धीरे ही सही शहरी औरतें अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारोँ को जान रहीं हैं पर अभी ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी लाने की आवश्यकता है क्योंकि अभी भी महिलाएं एवं बालिकाएं  शोषण का शिकार हो रही हैं। एक तरफ हम कहते हैं हमारा संविधान स्त्री एवं पुरूष में भेद नहीं करता लेकिन हमारे पुरूष प्रधान समाज में अधिकांश महिलाएं अपने अधिकारों का समुचित प्रयोग सामाजिक मान-मर्यादा को ध्यान मे रखते हुए नहीं कर पातीं और शारीरक और मानसिक रूप से यातनाएं सहती रहतीं है तो कुछ महिलाओं को उनके अधिकारों के विषय में पता ही नहीं चलता। बालिकाओं  और महिलाओं के यौन शोषण की घटनाओं में भी बाढ़ सी आ गई है । स्कूल ,कार्यालय ,सड़कों, पास-पड़ोस यहाँ तक कि अपने घरों में भी वे सुरक्षित नहीं है। आए दिन छोटी बच्चियों से लेकर बूढ़ी महिलाएं तक बलात्कार की शिकार हो रही हैं। अभी तीन दिन पहले अखबार में मैरिटल रेप के विषय में पढ़ा। लोगों के बीच बहस छिड़ी कि अब देखो इसकी क्या सजा होती है? इसके कुछ दिन पहले और एक खबर पढी छोटी बच्चियों के साथ रेप होने पर रेपिस्ट को फांसी होगी। मैं  कानून की ज्ञाता  तो नहीं पर बेटी, बहन,पत्नी, माँ, भाभी के रुप में एक स्त्री जरूर हूँ और इस नाते मैं यह कह सकती हूँ कि वे पीडि़त बच्चियां एवं महिलाएं छोटी या बड़ी हो सकती हैं जिसके कारण उनकी सोच एवं भावनाओं में अन्तर हो सकता है ये बात हम समझ सकते है लेकिन उनको व उनके परिवार को होने वाली मानसिक , शारीरिक एवं सामाजिक पीड़ा को कौन समझेगा? एक बात और रेपिस्ट के बालिग या नाबालिग होने से उसकी सजा निर्धारित करना।यहाँ भी मै यही कहूँगी कि यदि किसी के दिमाग में  रेप करने का विचार आ सकता है तो उसकी सोच तो बालिग ही हुई फिर चाहे वो भले ही नाबालिग हो।जुर्म साबित होते ही त्वरित सजा का प्रावधान होना चाहिए। मै न्याय व्यवस्था के खिलाफ नहीं हूँ । हमारे देश के सभी संगठन चाहे वे समाज सेवी संस्था हों, विहिप हों, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग या फिर खाप पंचायतें हो सभी को इस दिशा में ठोस कदम उठाकर जल्द से जल्द सजा सुनिश्चित कर पीड़िता न्याय दिलाना चाहिए। यदि हम सब ऐसा नहीं कर सकते तो हमेँ कन्या पूजन करने का कोई अधिकार नहीं।और हमें  "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रम्यते तत्र देवता" की अवधारणा को भुला देना चाहिए।

- सुषमा सिंह कर्चुली 

सिहोरा (जबलपुर) (मध्यप्रदेश)