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कविता : जूझती नारी - सुधा उपाध्याय 

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कविता : जूझती नारी

जा रही थी वह सड़क पर

जल रहे थे  पांव तल पर

चीथड़े लटके हैं तन पर

यौवन उभरे हैं तन पर

नाक नक्श हिरणी सी

हाथ में पकड़े हथौड़े  

बार बार करती प्रहार

सामने तरु भी नहीं है

चढ़ रही हैं धूप सिर पर

लूं झुलसा रही है

धरा जलती भास्कर से

गर्मियों के ताप पर से

जा रही थी वह सड़क पर

जल रहे थे पांव तल पर

लीन फिर भी कर्म पथ पर  

देख लो एक बार उसको

अपलक निहारती है बेबसी

फिर भी नहीं वो समझ लो

पहचान कर तुम  जग की  

सृष्टि को रचा इसने फिर

उन पर प्रहार क्यों हो

फिर उन पर प्रहार क्यों हो   

महिला शक्ति की जय हो

महिला शक्ति की जय हो

- सुधा उपाध्याय 

सिहोरा (जबलपुर)(मध्यप्रदेश)