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डब्ल्यू. डब्ल्यू. ई. में पहली भारतीय महिला रेसलर कविता दलाल से रचना शुक्ला का साक्षात्कार

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सच में फर्स्ट लेडी हैं कविता दलाल 

ना आना इस देश लाडो..........। कभी बेटी को जन्म लेने की भी इजाजत नहीं देने वाली सोच के लिए बदनाम हरियाणा राज्य की ही बेटी है कविता दलाल। वे विश्व प्रसिद्ध डब्ल्यू डब्ल्यू ई रेसलिंग में  भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली भारतीय महिला है। उन्होंने अपनी सफलता से ना केवल देश का नाम विश्व स्तर पर रोशन किया बल्कि  बेटियों के जन्म को लेकर पितृसत्तात्मक समाज में व्याप्त नकारात्मक सोच को भी चारों खाने चित कर दिया। हाल ही में उन्हें महिला एवं बाल विकास मंत्रालय नई दिल्ली द्वारा आयोजित कार्यक्रम में  महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने फर्स्ट लेडी के खिताब से सम्मानित किया है। कविता देवी हरियाणा के जींद  जिले के छोटे से गांव मालवी में पली-बढ़ी है। बचपन में इसी लड़की के खेलने कूदने पर रोक-लगाने वाले गांव के लोग आज जब इस लेडी खली को कुश्ती के रिंग में नामजद पुरुष पहलवानों को पटखनी देते देखते हैं तो दांतो तले उंगली दबा लेते हैं। उनके  गांव आने की खबर  से ही गांव  में किसी उत्सव सी तैयारी होती हैं। जुलाना ब्लाक  से खुली जीप में गाजे-बाजे के साथ मालवी  गांव ले जाया जाता हैं। मानों कह रहें हों कि "बेटी तुम जरूर आना और घर घर आना .....।"

1983 में हरियाणा के जींद जिले की तहसील जुलाना के एक छोटे से गांव मालवी के एक किसान परिवार में कविता देवी का जन्म हुआ। उनके परिवार में उनके अलावा चार अन्य भाई-बहन और माता-पिता थे । अनपढ़ होने के बावजूद माता-पिता ने सभी भाई-बहनों को पढ़ाया और समाज के सामने एक आदर्श स्थापित किया । कविता देवी बचपन से ही शारीरिक रूप से बेहद मजबूत और स्वभाव से दबंग थी l कमजोर आर्थिक स्थिति और समाज के विपरीत सोच के बावजूद परिवार ने उन्हें हमेशा खेलने कूदने के लिए प्रोत्साहित किया । बचपन से ही उनका खेलों के प्रति अधिक झुकाव था । गांव के ही सरकारी स्कूल में 12वीं तक  पढ़ाई पूरी की । गांव में कॉलेज नहीं था । इसीलिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना और खेल को निरंतर रखना दोनों ही चुनौतीपूर्ण था । इस बीच एक दौर ऐसा भी आया जब पिता की तबीयत खराब हो गई । तब अलसुबह सभी भाई बहन उठकर खेतों में काम करने जाया करते थे । तेज धूप और कड़ी मेहनत के बावजूद  दोपहर में  स्कूल जाते । बी. ए. की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सशस्त्र सेना बल में कांस्टेबल के रूप में नौकरी ज्वाइन की । सन 2006 में ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी में गोल्ड मेडल मिलने के साथ ही उनके खेल जीवन ने रफ्तार पकड़ ली ।  इसी बीच वॉलीबॉल खिलाड़ी  और सशस्त्र सेना बल में सेवारत गौरव तोमर से उनका विवाह हो गया । अब वे उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद के बींजवाड़ा गांव की बहू भी हैं । 2010 में उन्होंने सब इंस्पेक्टर के रूप में सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट ले लिया  और खुद को पूर्णरूपेण खेल जगत को समर्पित कर दिया ।

बेटी, बहन ,पत्नी और बहू का किरदार निभाते हुए वे 2012 में एक बच्चे की मां भी बन गई । डिलीवरी और बेटे की देखभाल के चलते वे शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो गई थी । 2 माह के बच्चे को लेकर जब वे खेल मैदान में प्रैक्टिस के लिए पहुंचीं तो नेशनल कोच उन्हे देख कर हंसने लगे । कुछ कर गुजरने की चाहत उनकी प्रबल थी । जिसके कारण जब तक दूसरे खिलाड़ी मैदान में पहुंचते तब तक वह अपनी एक ट्रेनिंग पूरी कर चुकी होती । मात्र 2 माह की प्रैक्टिस में ही उन्होंने 2013 की नेशनल वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल प्राप्त किया । 2016 में सोशल मीडिया और इंटरनेट पर एक वीडियो वायरल हुआ था । जिसमें द ग्रेट खली की जालंधर स्थित अकादमी में कॉन्टिनेंटल रेसलिंग एंटरटेनमेंट के दौरान एक महिला पहलवान बेबी बुलबुल मुकाबले के लिए  चुनौती देतीं हैं । तभी ठेठ देसी महिला सलवार कमीज में रिंग में उतरती है और पलक झपकते ही इस महिला पहलवान को धूल चटा देती है । यह देसी गर्ल कोई और नहीं वेटलिफ्टर कविता दलाल ही थी । इस वीडियो से उन्हें महिला रेसलर और खली की शिष्या के रूप में  पहचान मिली। जुलाई 2017 में अमेरिका में हुए डब्ल्यू डब्ल्यू ई मुकाबले में भी  सलवार कुर्ता पहन कर शामिल हुई थी। कविता दलाल ने न्यूजीलैंड की डकोटा काई को अपने एक हाथ से ही उठा कर पटक दिया था। डबल्यू डबल्यू ई में हार के बावजूद  उन्होने पूरे विश्व में रेसलिंग  के दिवानों का दिल जीत लिया। आज उन्हें हार्ड केडी के नाम से दुनिया में जाना जाता है l पेश हैं कविता दलाल यानी हार्ड केडी से रचना शुक्ला द्वारा लिए गए साक्षात्कार  के कुछ अंश ।

सवाल : सार्क देशों की वेट लिफ्टिंग में गोल्ड मेडल से लेकर डब्ल्यूडब्ल्यूई में शामिल होने वाली पहली भारतीय महिला रेसलर तक के सफर के बारे में कुछ बताइए ?
हार्ड केडी : खेल हो या कोई भी अन्य क्षेत्र हो । उसमें सफलता पाने के लिए हमें कठोर परिश्रम करना पड़ता है । यह एक लंबी यात्रा है इसके लिए हमें धैर्य भी रखना पड़ता है । मैंने यही दोनों किया । विश्व स्तर के मुकाबले में जब अपने देश का नाम रोशन करने और उसका नेतृत्व करने का मौका मिलता है तो बहुत खुशी होती है । बचपन में मैं गांव में बिना किसी साधन के पत्थरों के ढेर ईटों के ढेर के साथ एक बंद कमरे में रात में प्रेक्टिस किया करती थी । सफलता के रास्ते में कठिनाइयां तो आती ही है ।
 सवाल : रेसलिंग के विंग में आपने कई बार अपेक्षा से विपरीत साड़ी और सलवार कुर्ते जैसे पहनावे का चयन किया है ऐसा क्यों ?
 हार्ड केडी : साड़ी और सलवार कुर्ता  पहनकर जब मैं रिंग में उतरती हो तो कई बार भारत माता की जय जय महाकाली जैसे ओजस्वी नारे गूंज उठते है । मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपने देश को विश्व में लीड कर रही हूं । और अपने आप को ऊर्जावान महसूस करती हूं ।देश में मुझे सबसे बडा़ सम्मान राष्ट्रपति पुरुस्कार  मिला ।यह खुशी  हमेशा  मेरे मन में रहेगी ।समझिए  पहनावे  के माध्यम  से मैं देश के प्रति प्रेम के भावना  व्यक्त  होती  हैं ।

सवाल : आपकी इस उपलब्धि में किन-किन का योगदान उल्लेखनीय है ?
 हार्ड केडी :  बचपन में मुझे मेरे पूरे परिवार और खासतौर से भाई संजय दलाल ने काफी प्रोत्साहित किया । परिवार का सहयोग नहीं होता तो बचपन में ही प्रतिभा दब जाती है । खासतौर से शादी के बाद समाज में सब यही सोचते हैं कि बहू है तो उसे घर पर ही रहना चाहिए। बुजुर्गों की सेवा करनी चाहिए और बच्चे पर ध्यान देना चाहिए । इस सोच से हटकर मुझे पति और परिवार ने  सहयोग किया । मैं भी परिवार को लेकर चली ।

सवाल : कविता दलाल से कविता देवी, हार्ड केडी और लेडी खली आपके नामों में इतने बदलाव कैसे आए ?
 हार्ड केडी : कविता दलाल जैसे -जैसे आगे बढ़ती गई नाम बदलते गए । लोगों का प्यार मिलता गया । वेटलिफ्टिंग और रेसलिंग जैसे साहसिक खेलों की वजह से हार्ड केडी कहा जाने लगा । जालंधर में द ग्रेट खली की एकेडमी ज्वाइन करने के बाद  और रिंग  में मेरे प्रदर्शन  के चलते  लेडी खली का नाम मिला ।

सवाल : आपके साथ मात्र ₹15 की छोटी सी राशि की चोरी की कोई बात चर्चा में आई थी , वह क्या घटना थी ?
हार्ड केडी : चोरी शब्द का इस्तेमाल ही गलत है । मैंने तो उसके दरबार में पैसे मांगे थे जो इस पूरी दुनिया को पैसे देता है । यह बात उन दिनों की है जब मैं राष्ट्रीय खेलों के लिए प्रयासरत थी और हॉस्टल में रहा करती थी । कई दिनों से मेरे घर से कोई खर्चे के पैसे नहीं आए थे । मेरे पास ₹1 भी नहीं था । टूथपेस्ट खरीदने की जगह में नीम की दातुन से काम चला रही थी । जबकि मेरे साथ की दूसरी लड़कियां काफी खर्चा किया करती थी । मैं बहुत मेहनत कर रही थी और समय की भी  पाबंद थी । हालातों से दुखी होकर मैं मंदिर गई थी । वही मैंने भगवान से पैसे ले लिए इस वादे के साथ कि मैं इन्हीं लौटा दूंगी । जैसे ही मेरे पास पैसे आए तो मैं सबसे पहले मंदिर गई ।  मंदिर के पास मुझे एक मानसिक रूप से बीमार बच्ची मिली जो भूखी थी और लोगों से खाना मांग रही थी ।  मैने ₹15 से 3 गुजिया खरीद कर उस बच्ची को खिला दी और उसका पेट भर गया । यह घटना मुझे आज भी भावुक कर देती है ।

सवाल: नारीतंत्र के माध्यम से महिलाओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगे ?
हार्ड केडी : समाज में महिलाओं की स्थिति को देखकर मेरा दम घुटता था ।समाज  से विपरीत काम करने की वजह से मेरे परिवार को भी काफी संघर्ष का सामना करना पड़ा । खासतौर से जब परिवार  को जेल जाना पड़ा तब मैं पूरी तरह अकेला महसूस करती थी । उस समय  मेरे मन में यही बात थी कि आज अगर मैं हिम्मत हार गई तो फिर कभी कोई परिवार बेटियों को आगे बढ़ाने में इस तरह संघर्ष नहीं करेगा और साथ नहीं देगा । आज मेरे गांव में  लड़कियां खेलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं ।यही मेरी असली जीत  हैं ।