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लघुकथा : सम्मेलन - डॉ. रश्मि समीर दीक्षित

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लघुकथा : सम्मेलन 

लता ट्रेन की बर्थ पर आराम से लेटी थी। तभी दो लड़कियां जगह ढूंढते हुए वहां पहुची और उससे बोली - आंटी हम यहां बैठ जाएं, अगले स्टेशन तक जाना है।लता ने देखा दोनों कॉलेज स्टूडेंट लग रही थी।लता एक तरफ सरक गई और वो लडकिया बैठ गई। लता के पूछने पर उन्होंने बताया कि वे इस शहर के कॉलेज से MBA कर रही है। रोज अपडाउन करती है। कुछ देर बाद उन दोनों लड़कियों ने बातचीत शुरू कर दी तो लता भी उसमे दिलचस्पी लेने लगी। पहली ने कहा - क्यों मंजू ! तेरे पापा ने गार्डन कर लिया और केटरिंग वगेरह सब हो गया। बहुत बड़ा गार्डन किया होगा हैं न। और सेलिब्रिटी भी बुला रहे है क्या।तुम लोगो के पास तो बहुत पैसा है । और मोहितजी भी तो US में है वो कब आ रहे है। दूसरी लड़की बोली - अरे कुछ नही किया है, मेरी शादी तो हमारे समाज के सम्मेलन से होने वाली है। हमारे समाज में सभी लोग सम्मेलन में ही शादी करते है। हां कोई मज़बूरी या जल्दी हो तो ही अलग से शादी होती है क्योंकि यह साल में एक बार ही होता है। कोई अमीर हो या कम पैसे वाला वहाँ सारे जोडों को एक साथ बैठाकर शादी कराई जाती है। समाज के लोग मिलकर सभी जोड़ो को गृहस्थी का सामान, नकद राशि और अन्य उपहार देते है। और मिलकर सामूहिक भोज किया जाता है वो भी बिना किसी अपव्यय के। यदि किसी को अपने बच्चो को कुछ देना भी होता है तो वो सम्मेलन के बाद देते है। वहां सब एक से होते है। शादी के जोड़े (कपडे) तक समाजजन देते है जिससे किसी में हीन भावना न आये। मोहित भी जल्दी आ रहे है। हमने तो सोचा है कि शादी के बाद हम दोनों अपनी सैलरी से कुछ पैसा समाज कोष में दिया करेगे जिससे यह पूण्य कार्य निरंतर चलता रहे। अब तू बता यदि मेरे पापा बाहर सारे इंतजाम का 6-7 लाख खर्च करेंगे तो समाज में यह बहुत ही कम में हो जायेगा और मेरे साथ कितनी लड़कियों का भला हो जायेगा। उन लड़कियों की बात सुनकर लता सोच रही थी - हे ईश्वर! सभी लोगो की सोच इस तरह की हो जाये तो शादी विवाह को लेकर होने वाले मानसिक एवं आर्थिक संत्रास से बचा जा सकता है।

- डॉ. रश्मि समीर दीक्षित,

खंडवा (मध्यप्रदेश)