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लघुकथा : अवसर - डॉ. रश्मि समीर दीक्षित

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लघुकथा : अवसर

बड़े से गार्डन में युवक युवती परिचय सम्मेलन चल रहा था।आमंत्रित तो बहुत थे पर आये गिने चुने लोग ही थे। युवा वर्ग तो नदारद ही था और जो युवा उपस्थित भी हुए थे वे भी किसी कोने में छिपे से बैठे थे।आगे की पंक्ति में समाज के वरिष्ठ जन, और फिर अन्य लोग जिनमे बुजुर्ग और बच्चो के मातापिता थे। सम्मेलन कुछ विचार विनिमय और भाषणों के बाद शुरू हुआ। फिर युवक युवतियों को मंच पर परिचय के लिए बुलाया गया। सभी माता पिता अपने बच्चो को लगभग धकियाते हुए मंच पर भेजने लगे। रितेश जो बैठा बैठा ये सब कार्यक्रम देख रहा था, सहसा उठा और मंच पर जा पहुंचा और बोला - आदरणीय सज्जनों,  मै रितेश ,उम्र 37 साल ,शिक्षा एम्.बी.ए., मल्टीनेशनल कम्पनी में काम करता हूँ । 6 लाख सालाना का पैकेज है। फिर भी समाज में मेरे लिए कोई लड़की नही है। क्यों? आज मै आपको इसका कारण बताता हूं। इसका सबसे बड़ा कारण है अपेक्षाए। हमारे माता पिता आने वाली बहु से अपेक्षा करते है कि वो पढ़ी लिखी भी हो, संस्कारी हो, सुन्दर हो, पैसे वाली हो, नौकरी करे, घर का काम भी करे और भी न जाने कितनी अपेक्षाए। वो अपने बच्चो से नही पूछते कि उन्हें क्या चाहिए। कई माता पिता छोटी छोटी सी बातों को लेकर रिश्तो को फ़ैल कर देते है। आज हमारे समाज में कितने लड़के लडकिया कुँवारे है और माता पिता के सामने बोल नही पाते। लड़कियों के माता पिता भी लड़के में न जाने कितनी गुणवत्ता देखते है। बड़ा घर, पैसा, एकल परिवार, सरकारी नोकरी और भी कितने सवाल। आप बताए मध्यम वर्गीय समाज में ये सब एक जगह कैसे मिलेगा। मेरा आप सभी से मेरा यही अनुरोध है कि पांचो उंगलिया बराबर नही होती । यदि हम थोड़ा समझौता करना सीख जाए तो विवाह की ये सारी तकलीफे दूर हो जाये। इतना कहकर रितेश पुनः अपने स्थान पर आकर बैठ गया। आज उसने सही अवसर का लाभ उठाया था।

- डॉ. रश्मि दीक्षित,

खंडवा (मध्यप्रदेश)